Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 22–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 137, verses 22–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 22-24
संस्कृत श्लोक
तदहं हृदयं जन्तोराविशं विषमान्तरम् ।
नरोऽवयवसंबाधं नरवृन्दमिवाधिकः ॥ २२ ॥
अनन्तरमहं प्राप्तस्तेजोधातुं हृदन्तरे ।
दूरस्थमिव यत्नेन रात्राविन्दुमिवार्करुक् ॥ २३ ॥
यस्मात्त्रिभुवनादर्शो दीपस्त्रैलोक्यवस्तुषु ।
सत्ता सर्वपदार्थानां जीवस्तत्रावतिष्ठते ॥ २४ ॥
काये सर्वगतो जीवः स्वामोदः कुसुमे यथा ।
तथाप्योजसि किञ्जल्कैर्मुखे शैत्यं विवस्वता ॥ २५ ॥
तज्जीवाधारमोजस्तु प्रविष्टोऽहमलक्षितम् ।
रक्षितं परितः प्राणैर्वातैः प्रच्छादनं यथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ब्रह्माजी से लेकर तिनके पर्यन्त सब भूतों की दो प्रकार की उत्पत्ति
होती है-एक ब्रह्ममय और दूसरी भ्रान्तिज | इन दोनों को आप सुनिये | पहले की योनि के अनुभव से
बद्धमूल पहले के शरीरतादात्म्य की दृढ़ भ्रान्ति से तत्-तत् भूत और भूततन्मात्राओं के अनुरागवश
तदाकार से प्राणियों का जो जन्म होता है वह भ्रान्तिज जन्म कहा गया है, क्योकि वह दृश्य के संग से
होता है। इस विषय में “एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु-विनश्यन्ति' "यद् यद् भवन्ति तदा भवन्ति“
इत्यादि भगवती श्रुतिर्यो हैं । नित्यमुक्त ब्रह्मा को पहले कभी भी ध्यान मेँ न आई हुई जगद्भान्ति
होनेपर सृष्टि के आरम्भ में विर्वतवश हो रहा चतुर्विध जीव रूप से ब्रह्म का जो जन्म है वह ब्रह्ममय
जन्म कहा गया है, वह योनिज जन्म नहीं हे