Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 137, Verses 27–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 137, verses 27–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 137 · श्लोक 27-32
संस्कृत श्लोक
ततोऽञ्जः संप्रविष्टोऽहमामोद इव मारुतम् ।
उष्णांशुरिव शीतांशुं मृत्पात्रमिव वा पयः ॥ २७ ॥
द्वितीयेन्द्वंशुसंकाशे शुक्लाभ्रलवपेलवे ।
नवनीतगुडप्रख्ये क्षीरबुद्बुदसुन्दरे ॥ २८ ॥
तत्र पश्याम्यहं तिष्ठन्प्रवेशव्यग्रयोज्झितः ।
स्वौजसीव वसन्स्वप्न इव विश्वमखण्डितम् ॥ २९ ॥
सार्कं सपर्वतं साब्धि ससुरासुरमानवम् ।
सपत्तनवनाभोगं सलोकान्तरदिङ्मुखम् ॥ ३० ॥
सद्वीपसागराम्भोधि सकालकरणक्रमम् ।
सकल्पक्षणसर्वर्तु सहस्थावरजंगमम् ॥ ३१ ॥
तत्स्वप्नदर्शनं तत्र स्थिरमेव समं स्थितम् ।
वसाम्यत्येव निद्रान्ते निद्राऽन्ते नागता यतः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्ममय जन्म का अनुभव जन्मतः सिद्ध कपिल, सनक आदि महामुनियो को ही होता है, अज्ञानी
मच्छर आदि का ब्रह्ममय जन्म नहीं हो सकता अतएव प्रस्तुत मच्छर-जन्म भ्रान्तिजि ही था, इस
अभिप्राय से कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, एसी परिस्थितिमें वह मच्छर जगद्भ्रान्तिवश जन्मा था, ब्रह्मविवर्तवश नहीं
जन्मा था । अब आप उसकी क्रमिक चेष्टाओं को सुनिये । पृथ्वीपर ईख के झुरमुटों, घनी घास के
तिनको, काश, मूँज आदि के अम्बार में गूँजनेवाले मच्छरों में स्वयं भी गूँज रहे ओर क्रीडा कर रहे उस
मच्छर ने दो दिन की अपनी पूर्णायु का आधा हिस्सा (एक दिन) भोग लिया ॥२५.२६॥
आधी आयु (एक दिन) बीतने के उपरान्त दूसरे दिन की उसकी चेष्टा का वर्णन करते हैं।
उस मच्छर ने बाल-क्रीडावश स्वयं हरीघास के मध्यरूप झूले में चिरकालतक अपनी पत्नी मच्छरी
के साथ झूलना आरम्भ किया । झूलने की थकान से थका हुआ वह ज्योंही कहीं विश्राम करने लगा
त्योंहीं ऊपर हरिण के खुराग्रभागरूप पर्वत के गिरने से चूर हो गया । उसने हरिण की आकृति के दर्शन
से प्राण त्यागे थे इस कारण पहले मच्छर की देह ग्रहण करने में जो क्रम कहा गया है उसी क्रम से बाह्य
ओर आभ्यन्तर इन्द्रियों का ग्रहणकर तदनन्तर वह हरिण हो गया । अरण्य में इधर उधर भटक रहे
हरिण को व्याध ने धनुष से मार डाला । मरते समय उसकी दृष्टि व्याध के मुखपर पडी, अतएव अगले
जन्म में वह व्याध ही हुआ। विविध वनों में भटक रहा व्याध अकस्मात् मुनि के वन में जा पहुँचा । वहाँपर
उसने विश्राम किया । उसके सत्संगलाभरूप सौभाग्य से मुनि ने उसे ज्ञानोपदेश दिया : अरे व्याध, तुम
भ्रम में पड़े हो । इस क्षणभंगुर जगत् में दीर्घ दुःख के लिए मृगो को धनुष बाण से क्यों मारते हो ?
महाफल देनेवाली अहिंसा, अभयदान आदि शास्त्रमर्यादा का क्यों पालन नहीं करते २