Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
प्राणीकृतः स्वयमयं ननु चेतसात्मा देहीकृतस्त्रिभुवनीकृत एव नाद्यः ।
देहीकृतः खवपुरेव गिरीकृतश्च स्वप्नेषु कल्पितपुरीष्वनुभूतमेतत् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि वास्तविक विचार किया जाय तो जाग्रत भी स्वचिद्विकासमात्र ही ठहरता है उससे अतिरिक्त
नहीं, ऐसा कहते है ।
चिद्धातु का जो स्वविकास है वही कुछ तो स्वप्न कहलाता है और कुछ जाग्रत, ओर स्वप्न कोई
भिन्न पदार्थ नहीं हे