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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 38

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

परस्पर की दृष्टि से ये दोनों ही हैं और अपनी अपनी दृष्टि से दोनों जागरण ही हैं, ऐसा कहते है । स्वप्न में जाग्रत तो स्वप्न ही है। जाग्रत में स्वप्न स्वप्न ही है। स्वप्न तो अपनी दृष्टि से जाग्रत ही है जब इस प्रकार स्वदृष्टि से दिखाई देता है तब जाग्रत ही दो तरह से स्थित है