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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 40

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 40

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

तब मृत्यु, स्वप्न और जाग्रत से अतिरिक्त क्या है ? इसपर कहते हैं। हे महामते, मृत्यु नामकी कोई वस्तु है ही नहीं, क्योकि पुरुष चिन्मात्र हे । वह हजारों शरीरो के मरने पर भी कब मरा, किसका मरा, कैसे मरा ? यों तीनों प्रकार से वह प्रसिद्ध नहीं हे ॥३ ९॥ कल्पना करके शरीर ओर उसके मरने की बात कही, वास्तव में न शरीर है और न उसका मरण ही है, ऐसा कहते हैं। वह चिन्मात्र आकाश ही है । असीम ओर अखण्ड वह भ्रान्तिवश देहवत्‌ विकास को प्राप्त होकर मूर्तअमूर्तआकार से स्थित है