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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 49

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अन्तर्मुख जीव अन्तरात्मरूप अपने को अन्तर्जगत्रूप में देखता हुआ स्वप्न ओर बहिर्मुख जीव आत्मा को बाहर जगत्रूप में देखता हुआ स्वयं ही जाग्रत्‌ होता हे । वे ही इसके स्वप्न ओर जाग्रत हैं