Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 48
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हिन्दी अर्थ
यद्यपि यह
जीव अच्छेद्य है (छेदन-भेदन के योग्य नहीं है) ओर अदाह्य है (जलाने के योग्य नहीं है) तथापि अपने
को अन्यथा जानता हुआ द्वैतसंकल्परूपी यज्ञ से बालक के समान मोह को प्राप्त होता ही है