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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अतएव सवत्मिता के वास्तविक होने के कारण उसी के परज्ञान से ही यानी मैं सवत्मिक हू, इस प्रकारके ज्ञान से ही मुक्ति होती है, ऐसा कहते है । चिदात्मक मैं ही भीतर स्वप्न और बाहर जाग्रत्‌ हूँ, यदि ऐसा यथार्थ बोध हो जाय, तो क्रमशः प्रथम, द्वितीय आदि भूमिकाओं के परिपाक से वासनाविहीन होकर मुक्त हो जाता है