Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 46
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हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्य सूर्यमण्डलमें स्थित होकर भी अपनी आभा से यहाँ भी स्थित है, वैसे ही जगद्रूप
जीव बाहर ओर भीतर स्थित हे