Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
एकात्मक ही जीव बाहर ओर
भीतर अन्तरिक्ष, पृथिवी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ ओर दिशा के रूपसे व्याप्त होकर स्थित
हे