Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 44
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हिन्दी अर्थ
जिस समय चित्त
बहिर्मुख होता है उस समय यह जीव अपने जाग्रत् संज्ञक विकसित रूप को देखता है । जब चित्त
अंतर्मुख होता है तब यह जीव अपने रूपको स्वप्नरूप से देखता हे