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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जाग्रत का भोग करानेवाले कर्म के क्षीण होनेपर बाह्य से (जाग्रत से) निवृत्त होकर जीवाधार हृदय में स्थित हुआ जीव बाह्य संस्कार के अनुरोध से अपने स्वरूप को ही यह बाह्य स्वप्नसृष्टि है, ऐसा समझता हे