Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 138, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 138, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 138 · श्लोक 42
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हिन्दी अर्थ
चिदाकाश के उदर मेँ सकल अनुभवाणु वैसे ही प्रतीत होते हैं
जैसे कि अवयवी के विचित्र रूपरेखावाले अवयव प्रतीत होते हें