Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
प्रोह्यत्पर्वतपूरेण महावर्तविराविणा ।
वहद्वनालीतृण्याढ्यैर्व्याप्तेनोन्मूलितागया ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार चित्त भी चेत्य पदार्थो से निरूपणीय है, अतः चेत्य पदार्थो का अभाव होनेपर
चेत्यपृथकृकृत चित्त का स्वरूप नहीं है, यह भी सुख से कहा जा सकता है, ऐसा कहते हैं।
चेत्य पदार्थो का अभाव होने के कारण उक्त चित्त का भी अस्तित्व है ही नहीं । यदि कहो कि पूर्व
पूर्व चेत्य चित्त-निरूपक होगा, सो भी ठीक नहीं, क्योकि सृष्टि के आरम्भ में कारण का अभाव होने से
दृश्य की उत्पत्ति ही नहीं हे