Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 26,27
संस्कृत श्लोक
पूर्वमेवावदग्धायास्त्रिलोक्याः खण्डखण्डकैः ।
पूर्णेन परितः प्रौढैः खपुराद्रिमहीमयैः ॥ २६ ॥
अहं तत्रैव पश्यामि यावत्कस्मिंश्चिदास्पदे ।
कस्यांचित्पुरि कस्मिंश्चिद्गुहे वध्वा पुरे स्थितः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म सवत्मिक है इस कारण यदि उसकी सत्ता से मन आदि का अस्तित्व कहिये, तो मन आदि सब
वस्तुएँ हैं ही, ऐसा कहते हैं।
अत: यह सब ब्रह्म हे । जब ब्रह्म सर्वात्मक है तब यह विश्व चारों ओर यथार्थतः है ही । चित्त, देह
आदि सब कुछ है ही ब्रह्मज्ञों की दृष्टि से यह सब ब्रह्म ही है। जो ब्रह्मवेत्ता नहीं है, उनकी दृष्टि में यह
चित्त, देह आदि जैसा है वह हम तत्त्वज्ञानियों की समझ के बाहर की बात है