Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 139, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
इति यावत्क्षणं पश्यन्नहं तद्भावमागतः ।
परिरोदिमि दीनात्मा तावत्तत्सकलं गृहम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार यह सारा का सारा विश्व चारों ओर केवल चित्त ही ठहरता है, उससे
अतिरिक्त नहीं, चिदधिष्ठित चित्त तो ब्रह्म ही है, इससे सिद्ध हुआ कि यह विस्तृत जगत् ब्रह्म ही
(~) इससे अधिष्ठान का अन्यथाभाव नहीं हुआ, यह बतलाया ।
है उससे अतिरिक्त नहीं हे