Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 14, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मरिचस्यान्तरे तैक्ष्ण्यं शून्यत्वमिव चाम्बरे ।
त्रिजगत्सत्यसति च विद्यते चिन्मयात्मनि ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मिर्च
के भीतर तीक्ष्णता तथा आकाश के भीतर शून्यता की नाई तीनों जगत् सदसद्रूप (आविर्भावकालात्मक
एवं तिरोभावकालात्मक) चिन्मय परमात्मा में विद्यमान हैं