Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 14, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
इत्येवं भावयन्मुक्तभावया शुद्धसंविदा ।
शक्रः क्रमेण तेनैव तथैव ध्यानवानभूत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से देखता हुआ वह इन्द्र पूर्ववासना कल्पित उसी शरीर से क्रमश: वैसे ही ध्यानवान् हो गया