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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 14, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

कदाचिदासीत्तस्येच्छा प्रबोधबलशालिनः । ब्रह्मतत्त्वमवेक्षेऽहं यथावद्ध्यानवानिति ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

उसने अपने किसी कार्यवश कमलदण्ड के कोमलतन्तु के अन्दर चिरकाल तक निवास किया। उस बिसतन्तु के भीतर कल्पित ब्रह्माण्ड में राज्य करना तथा युद्ध मे जय - पराजय प्राप्त करना आदि भिन्न -भिन्न सैकड़ों वृत्तान्तो का भी उसने खूब अनुभव किया, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।।५॥ ज्ञान-बल युक्त उस राजा को कभी अचानक ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं भलीभाँति ध्यान लगाकर मायाशबलित ब्रह्म का स्वभाव देखू