Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 14, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

सोऽपश्यत्प्रणिधानेन तत एकान्तसंस्थितः । सबाह्याभ्यन्तरेऽशेषकारणत्यागशान्तधीः ॥ ७ ॥ सर्वशक्तिपरं ब्रह्म सर्ववस्तुमयं ततम् । सर्वथा सर्वदा सर्वं सर्वैः सर्वत्र सर्वगम् ॥ ८ ॥ सर्वतः पाणिपादान्तं सर्वतोक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य संस्थितम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसके बाद उसने एकान्त में स्थित होकर बाहर और भीतर के सम्पूर्ण विक्षेप कारणों के त्याग से शान्तबुद्धि होते हुए समाधि लगा करके सर्वविध शक्तियों से सम्पन्न, सर्ववस्तुमय, सर्वत्र व्याप्त, सब तरह से सर्वदा सर्वरूप ओर सबके साथ, सर्वगामी परब्रह्म को देखा, जो अनेक हाथ ओर पैरों से युक्त था, चारों तरफ जिसकी आँखें, मस्तक और अनेक मुख थे, सभी ओर अनेक श्रोत्रेन्द्रियो से युक्त तथा लोक में सबको आवृत करके जो स्थित था