Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अनन्तरमहं तस्मिन्मत्तैकार्णवरंहसि ।
जन्तोरोजः स्थितः स्वप्ने भ्रान्तं भ्रान्तो व्यलोकय ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मन ने जैसा
अभ्यास किया वैसा ही उसको प्राप्त हुआ । प्राण ही मेरा जीवन है परम प्रिय है इस तरह मन में खूब
अभ्यास किया था, इसलिये मन प्राण की अधीनता में स्थित है