Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 20–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verses 20–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 20-32
संस्कृत श्लोक
क्वचित्कमलवत्कीर्णलोकपालशिरःकरः ।
क्वचित्पङ्कजविश्रान्तरुधिरह्रदपाटलः ॥ २० ॥
क्वचिदाकण्ठनिर्मग्नक्वणद्विद्याधरीगणः ।
क्वचित्स्वप्नमृतेभाभयाम्योग्रमहिषावृतः ॥ २१ ॥
क्वचित्सन्नमहाकायगरुडामरपर्वतः ।
क्वचिन्मत्तमहासेतुर्यमदण्डेन भूजुषा ॥ २२ ॥
क्वचित्प्रमृतवैरिञ्चहंससस्मितपङ्कभूः ।
क्वचित्पङ्कविनिर्मग्नदेहार्धामरवारणः ॥ २३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सानुं प्राप्याश्रमे श्रमात् ।
विश्रान्तोस्मि यदा तेन भृशं निद्राजगाम माम् ॥ २४ ॥
ततः सुषुप्तनिद्रान्तस्तया वासनयान्वितः ।
तं तादृगेव कल्पान्तमपश्यं स्वौजसि स्थितः ॥ २५ ॥
दृष्ट्वा तद्द्विगुणं दुःखं चिरेणात्राहमाकुलः ।
प्रबुद्धो दृष्टवान्सानुं तमेवास्य हृदि स्थितम् ॥ २६ ॥
अथ तत्र द्वितीयेऽह्नि भास्करोदयसुन्दरम् ।
सलोकाकाशभूशैलं भुवनं दृष्टवानहम् ॥ २७ ॥
द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः ।
इति मे चेतसो जातं पत्रादि विटपादिव ॥ २८ ॥
ततस्तस्मिंस्तथा दृष्टे भूतले तैः पदार्थकैः ।
व्यवहारं प्रवृत्तोऽहं किंचिद्विस्मृतधीरितः ॥ २९ ॥
जातस्य मेऽद्य वर्षाणि षोडशैष पिता मम ।
इयं मातास्पदं चेदमिति मे प्रतिमोदभूत् ॥ ३० ॥
अपश्यं ग्रामकं कंचित्कंचिच्च ब्राह्मणाश्रमम् ।
किंचिद्गेहं तथा कश्चिद्वन्धुः कस्मिंश्चिदाश्रमे ॥ ३१ ॥
अथ मे तिष्ठतः सार्धं बन्धुभिर्ग्राममन्दिरे ।
अहोरात्रेषु गच्छत्सु जाग्रदादींस्तदेव सत् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि ने कहा : तदुपरान्त जिसके
हृदय में मैं प्रविष्ट हुआ था, वह रात्रि के समय आहार से खूब तृप्त होकर सुषुप्ति के समान घनी निद्रा
से सम्पन्न हुआ | वहाँपर मैंने उसके चित्त के साथ सुषुप्ति की खूब गाढ़ी नींद का अनुभव किया।
इसके पश्चात् उस प्राणी के उदरस्थ अन्न पच जानेपर नैसर्गिक नाडीमार्ग में स्पष्ट हुए प्राण का जब
संचार होने लगा तब सुषुप्ति (गाढ़ी नींद) कुछ हलकी हुई । सुषुप्ति के हलकी होनेपर मैंने सूर्य आदि
से युक्त भुवन को वहींपर देखा, जो हृदय से प्रादुर्भूत हुआ-सा था। उस भुवन को मैंने प्रलय काल में
क्षुब्ध हुए महासागर से निकली हुई जलराशि से पूर्यमाण देखा वह जलराशि ऐसी वैसी न थी, प्रलय
काल के मेघों द्वारा मूसलाधार वृष्टि से छोड़ी हुई-सी थी, उसमें आकाश को छूनेवाली बड़ी-बड़ी
तरंगे उठ रही थीं, उसके प्रवाह में पर्वत बहे जा रहे थे, बड़े बड़े आवर्तो (र्भवरों) से महान् कोलाहल
हो रहा था, बही जा रही वनराजिरूप तृणराशि से पूर्ण पर्वत चारों ओर बिखेरे थे, वृक्ष और पर्वतों
तक को उखाड़कर फेंक देनेवाली आँधी से तथा अग्नि की ज्वाला से पहले ही जलकर खाक हुई
त्रिलोकी के बड़े बड़े खण्डों से, जो आकाश में स्थित देवताओं के नगरों, पर्वतों और भूमि के भग्नवशेष
थे, वह चारों ओर भरी हुई थी । वहींपर मैं क्या देखता हूँ कि मैं किसी एक देश में किसी नगरी में
किसी घर में बहू के साथ बैठा हूँ, उक्त जलने मुझे स्त्री-पुत्र, बन्चु-बान्धव, नौकर-चाकर, साज-
सामान, घर-बार के साथ बहा दिया। वह घर और वह नगर प्रलयकाल की जलराशि द्वारा बहाया
जा रहा था, पेड़ के आकार की ऊँची-ऊँची लहरें उसे लाँघ रही थीं, जलराशि उसे चारों ओर से
भर रही थी, उसमें बड़ा भारी कोलाहल हो रहा था। अतएव वह (घर और नगर) सागर को जीतने के
लिए कटिबद्ध-सा मालूम पड़ता था । उस घर के निवासी लोग अत्यन्त उत्पीड़ित थे, और तो और
अपने बाल-बच्चों की भी किसी को सुधि न थी । आवर्तो से वह बहाया गया था, रोने चिल्लाने के
साथ-साथ छाती कूटने में संलग्न लोगों से तथा कीचड़ से वह बड़ा भयावना लगता था । ठह रही
दीवारों, फूट रहे काठों और टूट रही कीलों का उसमें घोर शब्द हो रहा था, छप्पर और खिड़कियोंपर
बैठी हुई स्त्रियों के मुँह इधर-उधर गिर रहे थे