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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 33–41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verses 33–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 33-41

संस्कृत श्लोक

ततः कालवशात्तत्र प्राक्तनी बोधधीर्मम । विस्मृता तादृशाभ्यासादहो तस्येव मत्स्यता ॥ ३३ ॥ इत्यहं ग्रामवास्तव्यः संपन्नो ब्राह्मणस्तदा । देहमात्रकबद्धास्थो दूरीकृतविवेकभूः ॥ ३४ ॥ शरीरमात्रात्मवपुर्दारमात्रानुरञ्जितः । वासनामात्रसारात्मा धनमात्रैकतत्परः ॥ ३५ ॥ जीर्णगोमात्रकधनः संरोपितलतावृतिः । संचिताग्न्यवनिप्राणिरुपार्जितकमण्डलुः ॥ ३६ ॥ चलवृक्षकबद्धास्थो लोकाचाररतः सदा । गृहपार्श्वगतानीलशाद्वलस्थलिकास्थितिः ॥ ३७ ॥ शाकशाकायतारामरचनानीतवासरः । सरिद्ह्रदनदीतीर्थसरसि स्नानतत्परः ॥ ३८ ॥ गोमयान्नजलाम्ब्वग्निकाष्ठेष्टा कष्टसंचयी । इदं कार्यमिदं नेति पाशाभ्यां विवशीकृतः ॥ ३९ ॥ इति मे जीवतस्तत्र संवत्सरशतं गतम् । एकदाभ्यागतो दूरात्तापसोऽतिथिरात्मवान् ॥ ४० ॥ पूजितोऽसौ विशश्राम मृद्गृहे स्नानपूर्वकम् । भुक्तवाञ्छयने स्थित्वा रात्रौ वर्णितवान्कथाम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार का तमाशा क्षणभर देख रहा, बहाव के चपेटे में पड़ा हुआ मैं ज्यों ही दीनहीन होकर रोने लगा त्योंही घर की दीवारों के चारों ओर से ढहने के कारण बालक, बूढ़े और स्त्रियों से पूर्ण वह सारा का सारा घर पत्थर पर गिरे हुए झरने के समान तरगों में पड़कर टुकड़े-टुकड़े हो गया । तदनन्तर प्रलय की जलराशि में मैं उतराने लगा । स्त्री आदि किसी का भी मुझे स्मरण तक न रहा, अपने प्राण बचाने की ही मुझे चिन्ता थी । तरंगों ने एक योजन से सैकड़ों योजन दूर मुझे फेंक दिया । जल में तैर रहे वृक्षों की चोटियां में धधक रही अग्निज्वालाओं के भीतर पड़ने से मेरा शरीर जर्जर हो गया । काठ, दीवार, तट, तख्ते आदि की असह्य टक्कर लगने से मेरा शरीर क्षत-विक्षत हो गया । मैं कभी आवर्तो के भ्रमण में पड़कर पाताल पहुँचकर बहुत देर बाद ऊपर उतराया प्रचुर तरंगवाली जलराशि में, जिसके चलने, रुकने, आने और हटने से खूब गुड़-गुड़ ध्वनि होती थी, मैं बार-बार डूबता और उतराता था । मैं जलके आघात से ढहे हुए ऊँचे पर्वत से कीच-कीच हुए जल में, दल-दलवाले पोखरे में हाथी के समान, क्षणभर डूबा,किन्तु दैववश प्राप्त हुए स्वच्छ जलने मेरा निस्तार कर दिया । समुद्र के गाज और पहाड़ के ढोंकेपर बैठकर ज्योंही मैं सुसताने लगा त्यों ही शत्रु की तरह महाजलराशि ने आकर मुझे लथेड़ दिया । चढ़ना, उतरना, आना, जाना, घूमना आदि विविध क्रियाएँ करनेवाली तरंगों से पूर्ण उक्त जलराशि के चक्कर में फँसे हुए अतएव दुःखित चित्तवाले मैंने जो दुःख नहीं झेला वह दुःख ही नहीं है यानी सभी दुःख मुझे झेलने पड़े