Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अन्यच्च विपिनाधीश कालः सर्वंकषो ह्ययम् ।
यत्र काले ततस्तस्मिंस्त्ववश्यंभावि तत्तथा ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
देह और प्राण की कल्पना करने
के बाद मैं फिर कभी भी देह और प्राण से वियुक्त होकर नहीं टिक सकता, अन्दर ऐसा दृढ निश्चयवाला
वह जीव हो जाता है किन्तु मैं चिन्मात्र स्वभाव हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चयवान् फिर नहीं होता