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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

बलं बुद्धिश्च तेजश्च क्षयकाल उपस्थिते । विपर्यस्यति सर्वत्र सर्वथा महतामपि ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

क्योंकि विपरित दृढ़ निश्चय की यथार्थ दृढ़ निश्चय के बिना निवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। सन्देहवश झूले की भाँति कभी एक पक्ष में कभी दूसरे असतृपक्ष में डोलनेवाला कुत्सित निश्चयों से दूषित चित्त दुःखी रहता है। इस तरह का इसका अत्यन्त दृढ़ यह भ्रान्तिज्ञान तत्त्वज्ञान के सिवा विकल्प से कदापि नहीं हटेगा