Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 61–62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verses 61–62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 61,62
संस्कृत श्लोक
अद्रावद्रौ दिशिदिशि ज्वलन्ति वनपङ्क्तयः ।
दग्धाः स्मृतिपदं याताः समस्ता रत्नभूतयः ॥ ६१ ॥
सर्व एवाब्धयः शुष्का महावाताः पुरःस्थिताः ।
अङ्गारराशितां यातं भूमण्डलमशेषतः ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
हा, परस्पर एक दूसरे पर लिपट रहे दैत्य और दानवों का अपने लिए या अपनी
स्त्रियों के लिए किये गये हल्ले से भरा हुआ बुड़-बुड़ शब्द सुनाई देता हे । हाहाकार चीत्कार से पूर्ण
देवता और दानवों के उत्तम-उत्तम नगरों के वेग के साथ गिरने के कारण क्षुब्ध हुई जलराशि से चारों
ओर परिवेष्टित दसों दिशाएँ मानों घूम रही मेघराशि से आच्छन्न सी हो गई हो उनमें जलकी साफ
दीवार खड़ी दिखाई देती है