Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 63–64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verses 63–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 63,64
संस्कृत श्लोक
पातालतो भूतलतोऽथ दिग्भ्यो ज्वाला विनिर्गन्तुमनुप्रवृत्ताः ।
संध्याभ्रवच्चाशु बभूव विश्वं ज्वालामये मण्डलमेकमेव ॥ ६३ ॥
ज्वालामये सद्मनि हेमपद्मकोशे भ्रमद्भृङ्ग इव प्रविष्टः ।
ततोऽहमाराच्छलभक्रमेण न चाप्तवान्दाहविकारदुःखम् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
हाय, खेद है, सर्वजन प्रसिद्ध सूर्य को जलराशि भँवरों के
चक्कर में लपेटकर वेग से बहुत नीचे ले गई है । ये कुबेर, यम, नारद, इन्द्र आदि जलराशि और
मेघमण्डल से पीडित (जीवन के अयोग्य) होकर प्राण-त्याग रहे हैँ । पूर्ववर्णित प्रकार के ब्रह्मा, इन्द्र
और विष्णु भगवान् के नगरों के खंडहरों से संकटपूर्ण जल की टक्कर लगने से कठोर आघात का
प्रत्यक्ष करनेवाले लोगों में जो तत्त्ववेत्ता हैं वे जल में बह रहे मृत अतएव जड़ अपने शरीर को अहंभाव
से विरहित होकर धारण करते हैँ । इसलिए शरीर के छेदन-भेदन, आघात आदि का दुःख उन्हे नहीं
होता हे