Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 140, Verses 65–67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 140, verses 65–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 140 · श्लोक 65-67
संस्कृत श्लोक
ज्वालामये साधु महाम्बुवाहे भ्रमाम्यहं विद्युदिवानिलात्मा ।
ज्वालापरिस्पन्दविलोलवर्ष्मा स्थलाब्जखण्डभ्रमरोपमश्रीः ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
देवता, दैत्य, सर्प, मनुष्य, नाग, अप्सराएँ ओर चारणो से व्याप्त काल द्वारा उखाड़कर मिट्टी में
मिलाया हुआ त्रिभुवन एकमात्र सागररूपी तालाब के रूप में स्थित हे । हाय ! प्रचुर समृद्धिवाले जगतां
के अधिपति इन्द्र देवता न मालूम कहाँ चले गये