Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 141, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
तत्र दंदह्यमानोऽपि नाभवं दुःखभागहम् ।
स्वप्ने स्वप्नोऽयमित्येष जानन्नग्नावपि च्युतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
व्याध ने कहा : महामुने, ज्ञानयोग सिद्ध आपके सदृश पुरुष भी पूर्ववर्णित नाना प्रकार की प्रलयजल
स्रवन आदि विविध भ्रान्तअवस्था को केसे प्राप्त हुए अतीत ओर अनागत सकल वस्तुओं के दर्शन में
उपायभूत ध्यानरूप योगांग के प्रयोग से आपकी सकल भ्रान्तियों की निवृत्ति क्यों नहीं हुई ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चालीसवाँ सर्ग प्रलय-सागर हटना, गाँव में मुनि की ब्रह्माण्डरूप से स्थिति, प्राणी के शरीर से बाहर निकलना आदि वर्णन ।