Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
जीवः सर्वेषु सर्गेषु स्वप्नार्थान्निखिलान्मिथः ।
प्राक्कर्मसत्वं मिथ्यात्म यथावासनमेषु च ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वर का और तत्त्वज्ञानियों का जगत्दर्शन कैसा है 2 इस प्रश्नपर कहते हैं।
वह चिदाकाश (चिन्मात्र) स्वभावतः आकाशरूप अपने शरीर का कुछ विचार से जो चिन्तन
करता है उस आकाश को ही जगद्रूप से जानता है