Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यथा प्राक्कर्म पुंस्त्वे च स्वप्ने पुंसां न विद्यते ।
इह जाग्रत्स्वप्ननृणां भातानामपि नो तथा ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तब सिद्धान्त में क्या है, ऐसा प्रश्न उठनेपर कहते हैं।
सिद्धान्त पक्ष में वह अति निर्मल चिन्मात्र ही है, जिसके सामने अत्यन्त सूक्ष्म आकाश भी वैसा ही
स्थूल लगता है जैसा कि परमाणुओं के सामने पर्वत