Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
स्वप्नद्रष्टुर्दृश्यनृणामस्ति काल्पनिकं यथा ।
न वास्तवं पूर्वकामं जाग्रत्स्वप्ने तथा नृणाम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सिद्धान्तपक्ष में शरीर आदि की प्रसिद्धि ही नहीं है, ऐसा कहते है ।
कहाँ शरीर है, कहाँ हृदय है, कहाँ स्वप्न है, कहाँ जल आदि हे, कहाँ बोध है, कहाँ बोधविनाश है
कहाँ जन्म, मरण आदि हैं