Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 8–9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 8,9
संस्कृत श्लोक
पृथ्व्यादि संभवति चेत्तत्सकारणमस्तु तत् ।
तदेव यत्र नास्त्येव तत्र किं तस्य कारणम् ॥ ८ ॥
ब्रह्मणः प्रतिभातं यत्तदिदं जगदुच्यते ।
तेनैव कुत एतानि पृथ्व्यादीनि क्व कारणम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सर्ग शब्द और अर्थ प्रसिद्ध हैं तो सर्ग शब्द और अर्थ हैं ही नहीं यह आप कैसे कहते हैं, ऐसा
व्याध की ओर से प्रश्न उठनेपर कहते हैं।
हे सौम्य, जिस स्वप्न आदि जगत् के यथार्थरूप को तुम जानना चाहते हो, उसके यथार्थरूप से
समझ में आ जानेपर अज्ञान की निवृत्ति हो जानेपर परमसिद्धान्तरूप परम पवित्र ब्रह्मरूप पदमे आरूढ
होकर मैं यह (सर्ग शब्द और अर्थ ही नहीं हैं यह वाक्य) कहता हँ । मूर्ख लोगों की बुद्धि में जो सर्ग शब्द
ओर अर्थ का अस्तित्व बद्धमूल है, उसका किसी प्रकार भी संभव न होने से मुझे कुछ भी पता नहीं है,
ज्ञानांश और अज्ञानांश से उत्पन्न प्रतीत हो रहा यह जगत् केवल चिन्मात्र का ही विकास है