Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
मृतं निर्माति चेदन्यः कथं वास्य स्मृतिर्भवेत् ।
कथं वा स्यात्स एवासौ चेतनत्वं तमेव खम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो नहीं होते ? इसपर कहते हैँ ।
सृष्टि के सृष्टिरूप से बद्धमूल होनेपर प्राक्तन कर्मो की कल्पना होती है । उसके बाद ये जीव
कर्मपाश से विवश होकर नाना योनियों मेँ भ्रमण करते हैं अर्थात् शुद्ध सात्विक शरीरों में कर्म
इसलिए नहीं रहते कि उनकी सर्गता बद्धमूल नहीं होती