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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verses 42–43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

मृतौ न जायते तस्माच्चेतसैव स केवलम् । इहायमित्थमित्येव वेत्ति खे वासनात्मकम् ॥ ४२ ॥ स्वमेव भावमभ्यस्तमास्ते सोऽनुभवंश्चिरम् । स्फुटप्रत्ययवांस्त्वत्र सत्यमित्येव वेत्त्यलम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

जहाँ यह सृष्टि सृष्टि ही नहीं हे, किन्तु ब्रह्म ही इस प्रकार सृष्टि के रूपसे स्थित है वहाँ कर्म कहाँ ? वे क्या अथवा किसके कहे जा सकते हैं ?