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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 143, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 143, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 143 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

खात्मा खमेव तत्रैव स्वप्नाभं दृश्यमाहरन् । पुनः स्वमरणं वेत्ति पुनर्जन्म पुनर्जगत् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्म जब है ही नहीं तब कर्मयुक्त बन्धन कहाँ ? अर्थात्‌ नहीं है, किन्तु अज्ञानप्रयुक्त ही बन्ध है, भले ही आप उसे कर्मबीज कहें पर वह अज्ञान से अतिरिक्त नहीं हैं ऐसा कहते हैं। परमात्मा का जो स्वयं अपने स्वरूप का अपरिज्ञान है वही यह कर्म बन्धनका कारण है अपना परमात्मस्वरूप जिसे ज्ञात है, उसका वह कर्म नष्ट हो जाता है ॥४ ३॥ इससे सिद्ध हुआ कि कर्म भी अविद्यारूप ही है इसलिए ज्यों ज्यों ज्ञानप्रकर्ष होता है त्यों त्यों कर्म का क्षय होता है, ऐसा कहते हैं। ज्यों ज्यों पण्डित का ज्ञान बढ़ता है त्यों त्यों उसका बन्धन में डालनेवाला कर्म बराबर क्षीण होता है