Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योम्नि स्वप्नसंवित्तिर्या सैव जगदुच्यते ।
सुषुप्तं प्रलयः प्रोक्तस्तस्मान्न्यायोऽयमेव सन् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पुरुष ने नगरी के अन्दर मिट्टी, घडा आदि पदार्थो की कार्य-
कारणता की कल्पना कर रक्खी हे वैसे तो ब्रह्मा ने आकाश, वायु आदि पदार्थो की दृश्य में जो कल्पना
कर रक्खी है वह वैसे ही रहे । यह शास्त्र नियमभंग के लिए नहीं है, किन्तु उसकी सत्यता, भिन्नता
आदि के विनाश के लिए है, यह भाव है