Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 11–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 11–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 11-21
संस्कृत श्लोक
दधत्याश्चित्स्वभावायाः संस्काराद्यभिधाः कृताः ।
प्रतिमायाः प्रभाविन्या न संस्कारादयः पृथक् ॥ ११ ॥
अपूर्वत्वात्स्मृतिः स्वप्नः संकल्पार्थानुभूतिषु ।
स्वमृत्यनुभवाद्यास्तु दृष्टार्थसदृशीषु च ॥ १२ ॥
इदं सर्गात्म सर्गादौ प्रतिमेव विजृम्भते ।
चिद्भामात्रात्मिका स्वच्छा नान्यन्नामोपपद्यते ॥ १३ ॥
ब्रह्मैव भाति जगदित्युक्तमुक्त्यानया भवेत् ।
न च भातं नवं तच्च ब्रह्मैवेदमतः स्थितम् ॥ १४ ॥
कारणं कार्यमित्युक्तः स पूर्वः स विशिष्यते ।
संस्कार इति तेनैष संस्कारः कृतिरुच्यते ॥ १५ ॥
तत्स्वप्नादावपूर्वोऽर्थो दृष्टान्त इति भाति यः ।
ससंस्कारादिनामोक्तो न बाह्योऽर्थोस्ति चेतसि ॥ १६ ॥
वस्तु दृष्टं न दृष्टं च सच्चास्ते चेतनेव खे ।
स्वभावाद्भाति स्वात्मापि दृष्टवच्चातिजृम्भते ॥ १७ ॥
वेदान्तार्थात्मकं पूर्वसर्गाभावं प्रवर्तते ।
ततो वेद्यव्यवस्था ज्ञैः क्रियते स्वार्थसिद्धये ॥ १८ ॥
स्वप्ने तु जाग्रत्संस्कारो यस्तज्जाग्रत्कृतं नवम् ।
अजाग्रज्जाग्रदाभासं कृतमित्येव तद्विदः ॥ १९ ॥
ततो वायाविवास्पन्दाश्चित्ते भावाः स्थिताः स्वतः ।
ते स्वतः संप्रवर्तन्ते कात्र संस्कारकर्तृता ॥ २० ॥
एकं तथा च चिन्मात्रं स्वप्ने लक्षात्म तिष्ठति ।
पुनर्लक्षाद्यतः स्वप्न एकमास्ते सुषुप्तकम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पिता आदि की तरह उनके कर्म आदि भी अवास्तविक ही हैं, ऐसा कहते हैं।
जैसे स्वप्नलोक के पुरुषों के पुरुषादि रूप में उत्पन्न होने में निमित्तभूत प्राक्तन कर्म नहीं हैं, वैसे
ही यहाँ भासित हो रहे जाग्रतरूप स्वप्न के मनुष्यों के भी प्राक्तन कर्म नहीं हैं | जीव जैसे सृष्टियों में
सकल स्वप्नपदार्थो को परस्पर देखता है, वैसे ही अपनी वासना के अनुसार मिथ्याभूत सकल व्यवहार
में प्राक्तन कर्म के अस्तित्व को, जो सर्वथा मिथ्या है, अपनी वासना के अनुसार ही देखता है । जीव
भूत, भुवन आदि की सृष्टि से लेकर देहसिद्धि पर्यन्त संसार में स्वप्नपदार्थो की तरह ही अपने संकल्प
के अनुसार परस्पर प्रतीत होते हैं, इसलिए स्वप्न पदार्थो की तरह संवेदनांश में विद्यमान भी वे अन्य
अंश में अविद्यमान ही हे । भावना कर रहे पुरुष को सब पदार्थ अपने संकल्प के अनुसार अपनी आत्मा
में प्रतीत होते हैं और जाग्रत के समान स्वप्न में भी परस्पर अर्थक्रिया में समर्थ होते हें । जैसे स्वप्न में
बाह्य पदार्थो के अभाव में भी आपकी भोजन आदि की संकल्प संवित् ही पाक आदि संवित् के क्रम से
मुँह में कौर डालने के रूप से तृप्तिरूप फल प्राप्त कराती हे वैसे ही जाग्रत-संवित् भी हे । स्वप्न अस्फुट
है लोकनिष्ठता से जाग्रत स्फुट है, यही जाग्रत ओर स्वप्न में अन्तर हे । स्वभाव में स्थित भास्वर शुद्ध
संवित् स्फुट हो चाहे अस्फुट, जो भी होकर स्वयं भासित होती है उसके उस भाव के जाग्रत ओर स्वप्न
दो नाम लोक में रखे गये हैँ । भूत, भुवन आदि की सृष्टि से लेकर देहसिद्धि पर्यन्त जिस वेदन का जैसे
भान होता है वह मोक्षपर्यन्त प्रवाहरूप से जैसा का तैसा रहता हे । वही यह सर्ग कहलाता हे । जाग्रत्
और स्वप्न में प्रसिद्ध की ओर अमूर्त होने के कारण अप्रतिघातरूप उनकी संवित् की वैसे ही भिन्नता
नहीं है, जैसे कि प्रकाश ओर आलोककी भिन्नता नहीं हे, जैसे अग्नि ओर उष्णता की भिन्नता नहीं है
ओर जैसे तरंग के साथ द्रव और जलकी भिन्नता नहीं हे अथवा जैसे शीतलता ओर वायु की भिन्नता
नहीं हे । "नेति नेति" इस श्रुति द्वारा निषिद्धयमान होने के कारण निषेधार्थक नञ् (न) से ओर उसके
अर्थ प्रतियोगिता से युक्त असद्रूप सम्पूर्ण जगज्जाल अधिष्ठानभूत चित्स्वभावतावश अमूर्तं चिन्मय
होने के कारण प्रतिघातसह शान्त सन्मय ही है । ब्रह्म जगद्रूप से उत्पन्न होकर और प्रलयरूप से मरकर
दृश्यानुभवरूपी होने से सर्वात्म व्यवहार में दृश्यानुभवरूप है, किन्तु परमार्थ मेँ अजर, अमर, शान्त,
एक चिन्मात्र ही स्थित है