Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रपरमाणुः सञ्जगदात्माप्ययं नभः ।
यत्र तिष्ठाम्यहं तत्र पश्यामि भुवनत्रयम् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार गऊ घडा आदि सवमें समझना चाहिये, ऐसा कहते है।
जो चिदाकाश की शून्यता झटपट जिस वस्तुरूप में भासित होती है उस वस्तुता से वैसे ही
कार्यकारणभाव का आश्रय किया गया है । जैसे कि गऊ दूध का कारण है और घड़ा दूध के धारण का
कारण हे