Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
तस्मादहं पराण्वात्मा समस्तजगदाकृतिः ।
सर्वत्रैव च तिष्ठामि परमाणूदरेऽपि च ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
“स भूरिति व्याहरत्" (उसने “भू
उच्चारण किया ओर भुवन की सृष्टि की) इत्यादि श्रुतियों के अनुसार हिरण्यगर्भ के (ब्रह्मा के) हृदय
चैतन्य में सृष्टि के आरंभ में ही वर्तमान हे । उस प्रकार से स्थित उसी की स्वभाव (पृथिवी का गन्ध तथा
काठिन्य स्वभाव, जलका द्रवत्व स्वभाव, तेज का उष्ण ओर प्रकाश स्वभाव, वायु का गमन ओर सूक्ष्मता
स्वभाव इत्यादि रूप से), काल (अतीत, अनागत आदि काल के रूप से) तथा देश आदि से (पूर्व,
पश्चिम आदि देशों के रूप से) तत्-तत् संज्ञाएँ की गई हैं