Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्र एव भुवनं त्वमहं चिन्मयं जगत् ।
इति न्यायाज्जगद्याति परमाणूदरेऽप्यजम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हृदय में स्थित
संकल्प-नगर में चिदादित्य की (चितूसूर्य की) स्वप्रकाशतारूप अवस्था सदैव रहती है वही यह
कार्यकारणता सृष्टि के पदार्थों में उत्पन्न स्वभावसिद्ध है