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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

तस्माद्यत्र चिदाकाशमनन्तं सततं स्थितम् । तत्रास्तीति जगद्भानं तदङ्गानन्यरूपि यत् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

संकल्पनगर ओर उसकी अन्दरूनी व्यवस्था केवल चिदाकाश का विकास ही तो हे, यह बात अपने अनुभव से सिद्ध हे । यह परिदृश्यमान सृष्टि भी हिरण्यगर्भ के संकल्प से उद्भूत होने के कारण संकल्प- सृष्टि के अन्तर्भूत ही श्रुति, पुराण आदि में कही जाती है, उससे पृथक्‌ नहीं हे