Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योम संविन्मात्रं यत्परमाणुवदाततम् ।
अनादिमध्यपर्यन्तं तदेव जगदुच्यते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
तुमने भी अपने संकल्पनगर में स्वेच्छानुसार कार्यकारणरूपिणी व्यवस्था कर रक्खी है, यों सिद्धवत्
मानकर कहते है।
तुमने अपने स्वप्ननगर में जैसी कार्यकारणरूपिणी व्यवस्था स्थापित कर रक्खी है सृष्टिरूपी
स्वप्ननगर में संकल्परूपिणी चिति ने भी वैसी ही कार्यकारणरूपिणी व्यवस्था बाँध रक्खी है