Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
मुनिरुवाच ।
अकारणक एवायं सर्ग आदौ प्रवर्तते ।
समस्तकारणाभावाद्यतः सर्गात्मचिन्नभः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
कब ब्रह्म में सृष्टि का अभाव ज्ञात होता है ? ऐसा प्रश्न उठनेपर कहते हैं।
जब कठिनाई के साथ साधनों के अभ्यास से देशकृत, कालकृत और वस्तुकृत-त्रिविध परिच्छेद
से शून्य चिन्मात्र का स्वभावतः ज्ञान होता है तब जाकर इस सृष्टि में विसर्गता (सृष्टि का अभाव)
प्रतीत होती है जैसे कि रज्जुसर्प का यह सर्प नहीं है, रज्जु है, यों ज्ञान होनेपर फिर रज्जुका रूप ज्ञात
होता हे