Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
भाति स्वप्ने यदा जन्तोर्जगदानन्दमाततम् ।
चिदणोरेव तद्भानमात्मनस्तत्पदात्मना ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐहलौकिक सृष्टि के समान पारलौकिक सृष्टि भी ऐसी ही है, ऐसा कहते है ।
वह मरकर स्वप्न की तरह सम्पूर्ण जगत् को पृथक् देखता है, उसके बाद होनेवाली पारलौकिक
अन्य देह का वह सारा जगत् अमूर्त चिदाकाश ही है