Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
व्याध उवाच ।
अकारणं चेद्दृश्यं तत्कथमेतत्प्रसिध्यति ।
सकारणं चेद्दृश्यं तत्स्वप्ने सर्गादिधीः कुतः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
व्याध ने कहा : हे मुनिवर, इस देहके छूट
जाने के बाद अन्य देह कैसे उत्पन्न होती है उसका कौन उपादान कारण है ओर कौन निमित्त ओर
सहकारी कारण है ?