Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
अबुद्धिपूर्वं चानिच्छमेवमेव प्रवर्तते ।
काकतालीयवत्स्पन्दादावर्ता इव वारिणि ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस
प्रकार कोटि कोटि जगत् हैं। यदि उनका रहस्य तत्त्व जान लिया जाय तो वे सब ब्रह्मरूप ही हैं
अन्यथा (तत्त्व ज्ञात न हो तो) वे केवल एकमात्र दृश्य ही हैं