Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 47–48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 47–48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 47,48
संस्कृत श्लोक
संनिवेशो हि नियतिस्तां विना प्रतिघोदयम् ।
ब्रह्म स्थातुं न शक्नोति तच्च सर्वात्मताक्षयम् ॥ ४७ ॥
एवं सकारणं सर्वं सर्वदा दृश्यमण्डलम् ।
यस्य सर्गे यतः कालात्ततः प्रभृति तं प्रति ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त कोटि-कोटि जगतों द्वारा
किसी का कुछ भी आवृत नहीं हुआ । वास्तव में वे हैँ ही नहीं । उन जगतां मे प्रत्येक जीव यही केवल
एक जगत् है अन्य जगत् नहीं है, ऐसा जानता है । उक्त कोटि-कोटि जगतों के पृथिवी आदि पंचभूत
ओर जरायुज, अण्डज, स्वेदज ओर उद्भिज्ज भेद से चार प्रकार के प्राणी तत्-तत् जीवों के अभीष्ट
जगत् में वैसे ही (उस जगत् के अनुरूप ही) हैं उसके अनुकूल नहीं हं । वे सबके सब असत्य व्यवहार
दृष्टि से सत्य है, सत्य परमार्थ दृष्टि से अजन्मा ब्रह्मरूप ही हैं