Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
भात्यकारणकं ब्रह्म सर्गात्माप्यबुधं प्रति ।
तं प्रत्येव च भात्येष कार्येकारणदृग्भ्रमः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए ज्ञानी ओर अज्ञानी की दृष्टि में सत्य ओर असत्य परस्पर विपरीत है यानी जिसको
ज्ञानी सत्य समझता है उसे अज्ञानी असत्य और जिसे ज्ञानी असत्य समझता है उसे ज्ञानी सत्य,
ऐसा कहते है ।
तत््वज्ञाता की दृष्टि से जो (पर ब्रह्मरूप वस्तु) सत्य है वह अज्ञ की दृष्टि में कभी निवृत्त न होनेवाला
असत्य है और जो ज्ञानी की दृष्टि मे असत् है वह अज्ञानी की दृष्टि में अतिस्पष्टरूप से सत्य हे