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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 51–53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 144, verses 51–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 51-53

संस्कृत श्लोक

सकारणत्वं भावानामवश्यंभाविनि क्रमे । जाग्रत्स्वप्नदृशो नेह संभवन्त्यपकारणाः ॥ ५१ ॥ सर्ववस्तुषु कचन्ति सर्वदा युक्तयः स्फटिकशुक्तयो यथा । भावनानुभव एव स स्वयं शक्तिमाञ्जयति जीवितात्मकः ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा जिसके प्रति जव जिस जगत्‌ का भान होता है, उसके प्रति तव वह सत्य है, यह सत्यता की व्यवस्था है, ऐसा कहते हैँ । जिस-जिस जगत्‌ का जिस-जिस संवित्‌ के प्रति भान होता है वह वह उस संवित्‌ के प्रति नित्य सत्य है, क्योकि जगद्रूप सत्य है अथवा असत्य है इस बात का अपनी सत्य संवित्‌ से ही निर्णय करना चाहिये । वह भगवती संवित्‌ "सत्य है” ऐसा निर्णय करती है, तो दूसरा कोन उसके निर्णय को विपरीत सिद्ध कर सकता है, क्योंकि उसका निर्णय अमोघ है । यदि यह सब संविद्‌-मात्र से निर्णय हे तो जहाँ जैसा संवित्‌ को भासता है, वैसा ही हे । संवेदनानुसार प्रतीत हुई वस्तुराशि में क्या भेद है क्या अभेद है ? क्या द्वित्व ओर एकत्व की ही कथा है ? यह ज्ञेय ज्ञानरूप ही है यों ज्ञान और ज्ञेय का अभेदज्ञान होने से यह दृश्यसमूह ज्ञान ही हो जाता है, इसीसे सकल द्वैत की निवृत्ति होने के कारण चिद्‌-अद्रित सिद्ध हुआ, यह भाव हे । शंका: ज्ञान के अपलाप द्वारा ज्ञान ही ज्ञेय रूप हो यों जञेयमात्र का ही परिशेष क्यो नहीं मानते हो ? समाधान - हाँ ठीक है, ज्ञान ही ज्ञेय है यों दृश्यका परिशेष तभी सम्भव है जब कि ज्ञप्ति (ज्ञान) असत्य हो । और यदि ज्ञान को असत्य मानो तो ज्ञप्तिरहित ज्ञेय की सिद्धि ही नहीं होगी, यह भाव है